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आदिवासी अस्मिता का महापर्व ‘बस्तर पंडुम’: बस्तर की संस्कृति, स्वाभिमान और सुशासन का भव्य उत्सव

रायपुर। गोंडी भाषा में ‘पंडुम’ का अर्थ होता है पर्व या उत्सव है, ‘बस्तर पंडुम’ यानि बस्तर का उत्सव। यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि वह जीवंत दस्तावेज है, जिसमें बस्तर की आत्मा, उसकी परंपराएं, उसका संघर्ष और उसका आत्मविश्वास एक साथ परिलक्षित होता हैं। बस्तर पंडुम 2026 ने इस भाव को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम किया है। बस्तर पंडुम, बस्तर की जनजातीय जीवनशैली, लोक कला, नृत्य, संगीत, शिल्प, खान-पान और प्रकृति-पूजन की परंपराओं का विराट मंच बनकर उभरा।

ऐतिहासिक सहभागिता से सम्पन्न हुआ जन-जन का उत्सव

54,745 से अधिक प्रतिभागियों के पंजीयन के साथ बस्तर पंडुम 2026 ने नया कीर्तिमान स्थापित किया है। 07 से 09 फरवरी 2026 तक चले संभाग स्तरीय आयोजन में 84 दलों के 705 चयनित कलाकारों ने 12 पारंपरिक विधाओं में अपनी प्रस्तुति देकर यह प्रमाणित किया है कि बस्तर की संस्कृति और अस्मिता आज भी जीवित, सशक्त और सतत है।बस्तर के महिलाओं की सशक्त भागीदारी ने इस आयोजन को और भी समावेशी बना दिया है। महिलाओं की भागीदारी इस बात का संकेत है कि बस्तर की सांस्कृतिक धारा में नारी शक्ति अग्रिम पंक्ति में है।

बस्तर की विविध विधाओं में छुपा है परंपरा का संपूर्ण संसार

बस्तर पंडुम 2026 में सम्मिलित 12 विविध विधाएँ बस्तर की समग्र सांस्कृतिक चेतना को प्रतिबिंबित करने वाली हैं, जिनमें है,जनजातीय नृत्य,जनजातीय गीत, नाट्य, पारंपरिक वाद्ययंत्र, पारंपरिक वेशभूषा एवं आभूषण, जनजातीय पूजा पद्धति, बस्तर शिल्प, बस्तर चित्रकला, जनजातीय पेय पदार्थ, जनजातीय व्यंजन, आंचलिक साहित्य और बस्तर वनौषधि जैसी विधाओं में स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देना सरकार की उस नीति का प्रमाण है जो मंच के केंद्र में स्थानीय प्रतिभा को रखकर उन्हें संरक्षण प्रदान करता है।

राष्ट्रपति की उपस्थिति ने दिया आदिवासी सम्मान का संदेश

7 फरवरी 2026 को जगदलपुर में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा बस्तर पंडुम 2026 का भव्य उद्घाटन हुआ। राष्ट्रपति, राज्यपाल रमेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बस्तर चित्रकला स्टॉल का अवलोकन कर आदिवासी जीवन, प्रकृति और परंपराओं की सजीव झलक देखी।
महामहिम राष्ट्रपति ने दंडामी माड़िया, अबूझमाड़िया, मुरिया, भतरा और हल्बा जनजातियों की पारंपरिक वेशभूषा धारण कर युवक-युवतियों के साथ स्मृति चित्र भी लिया। इस दृश्य को आदिवासी सम्मान का राष्ट्रीय संदेश भी माना जा सकता है।

प्रधानमंत्री का छत्तीसगढ़वासियों को संदेश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘बस्तर पंडुम’ के आयोजन की छत्तीसगढ़वासियों को बधाई देते हुए कहा कि “ऐसे आयोजन सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और स्थानीय समुदायों के सशक्तीकरण में अहम भूमिका निभाने वाले होते हैं।पहले बस्तर का नाम आते ही माओवाद, हिंसा और पिछड़ेपन की छवि बनती थी। आज हालात बदल चुके हैं। बस्तर विकास और बढ़ते आत्मविश्वास के लिए जाना जाता है।” प्रधानमंत्री का यह कथन केवल राज्य की प्रशंसा नहीं बल्कि हो रहे परिवर्तन की आधिकारिक स्वीकृति है।

मुख्यमंत्री साय साबित हुए संस्कृति के संरक्षक, सुशासन के प्रतीक

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की भूमिका बस्तर पंडुम 2026 की आत्मा में रची-बसी है। उनकी दूरदर्शी सोच और संवेदनशील नेतृत्व ने यह सिद्ध किया कि विकास का अर्थ केवल भौतिक ढाँचा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान भी है। उनके नेतृत्व में सरकार ने यह संदेश दिया कि जनजातीय अस्मिता कोई स्मारक नहीं, बल्कि जीवित विरासत है—जिसे मंच, मान और मान्यता चाहिए।

लालबाग मैदान बना सांस्कृतिक इतिहास का साक्षी

जगदलपुर का लालबाग मैदान बस्तर पण्डुम जैसे ऐतिहासिक आयोजन का साक्षी बना। इस समारोह के समापन ने पूरे देश का ध्यान बस्तर की गौरवशाली विरासत की ओर आकृष्ट किया था। इस आयोजन में पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, शिल्प और खान-पान सब कुछ अपने मौलिक स्वरूप में प्रस्तुत किया गया। बस्तर पण्डुम वास्तव में संस्कृति का संरक्षण और संस्कृति का उत्सव था।

बस्तर के सुकमा सांस्कृतिक गौरव का नया अध्याय

सुकमा जिला प्रशासन की उत्कृष्ट समन्वय क्षमता और संवेदनशीलता इस आयोजन में स्पष्ट दिखाई दिया।छिंदगढ़ विकासखंड के किंदरवाड़ा निवासी गुंजन नाग और किरण नाग ने जनजातीय वेशभूषा प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर पूरे बस्तर को गौरवान्वित किया।उनकी इस उपलब्धि पर गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा 50 हजार रुपये का प्रोत्साहन और स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया जो कलाकारों के प्रति सरकार के सम्मान का जीवंत उदाहरण बना।

कलाकारों की सहभागिता ने रचा इतिहास

अकेले सुकमा जिले से 12 विधाओं में 69 कलाकारों की सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि कलाकारों को जब मंच मिलता है तो उनकी प्रतिभा स्वयं मार्ग बना लेती है। उनकी यह सहभागिता केवल प्रस्तुति नहीं बल्कि आत्मसम्मान, पहचान और सुनहरे भविष्य का बाई प्रतीक बनी। बस्तर पंडुम 2026 में महिलाओं की भागीदारी ने यह दिखाया कि जनजातीय समाज में नारी शक्ति संस्कृति की वाहक है। नृत्य, गीत, वेशभूषा, शिल्प और व्यंजन—हर क्षेत्र में महिलाओं की सक्रिय उपस्थिति ने आयोजन को पूर्णता दी।

संस्कृति, संरक्षण और विकास ही रहा साय सरकार का बस्तर पंडुम मॉडल

बस्तर पंडुम 2026 स्पष्ट करता है कि विष्णुदेव साय सरकार का विकास मॉडल केवल सड़कों, भवनों और योजनाओं तक सीमित नहीं बल्कि यह मॉडल संस्कृति, परंपरा और पहचान को समान महत्व देने वाला है। बस्तर पंडुम यही संदेश देता है कि विकास और परंपरा विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। मगर इसके लिए नेतृत्व का संवेदनशील होना आवश्यक है।

राष्ट्रीय से वैश्विक मंच की ओर बढ़ता बस्तर पंडुम

बस्तर पंडुम 2026 ने बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक मंच पर भी मजबूती से प्रस्तुत किया। बस्तर पंडुम का आयोजन पर्यटन, हस्तशिल्प, लोक कला और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी नई संभावनाओं का द्वार खोल रहा है। बस्तर पंडुम बस्तर की नई पहचान है जिसमें अतीत की जड़ें और भविष्य के सपने मिलते नज़र आतेहैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में यह उत्सव यह बस्तर की जनता को भरोसा देता है कि बस्तर अब अपनी संस्कृति के साथ, आत्मविश्वास के साथ और सम्मान के साथ आगे बढ़ रहा है। बस्तर पंडुम केवल तीन दिनों का पर्व नहीं बल्कि यह बस्तर के उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष है।

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