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आलेख: अहिंसा की अनंत धारा—महावीर स्वामी के विचार आज और भी प्रासंगिक: संदीप अखिल

न हि वेरेण वेराणि, सम्मन्ति इध कुदाचनं। अवेरेण च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥” अर्थात् इस संसार में वैर से वैर कभी समाप्त नहीं होता, बल्कि प्रेम और अहिंसा से ही वैर को समाप्त किया जा सकता है और यही सनातन धर्म है.

आज 31 मार्च 2026 को समूचा देश महावीर जयंती का पावन पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मना रहा है. महावीर जयंती एक धार्मिक उत्सव होने के साथ ही आत्ममंथन और मानवता के उच्चतम मूल्यों को पुनः स्मरण करने का अवसर भी है. आज के अशांत और भौतिकतावादी युग में भगवान महावीर का जीवन त्याग, तप, सत्य और अहिंसा की ऐसी जीवंत गाथा है, जो वर्तमान में और भी प्रासंगिक हो गई है.

लगभग 599 ईसा पूर्व वैशाली के क्षत्रियकुंड में जन्मे महावीर स्वामी को बाल्यकाल में वर्धमान के नाम से पुकारा जाता था वे बचपन से ही असाधारण धैर्य, साहस और करुणा से भरे थे . राजसी वैभव के बावजूद वर्धमान के भीतर संसार की क्षणभंगुरता को लेकर एक गहरी बेचैनी थी. यही बेचैनी आगे चलकर उनके वैराग्य का कारण बनी और 30 वर्ष की आयु में उन्होंने सब कुछ त्यागकर तपस्या का मार्ग चुन लिया.

तपस्या से मिला आत्मज्ञान

महावीर स्वामी के जीवन दर्शन के मूल में यही रहा कि आत्मज्ञान कोई बाहरी उपलब्धि नहीं बल्कि अंतस की यात्रा है. उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई 12 वर्षों की कठोर तपस्या, मौन, उपवास और आत्मसंयम के बाद . केवलज्ञान, बौद्धिक ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन के सत्य का साक्षात्कार भी था— केवल ज्ञान एक ऐसा सत्य है जो अहिंसा, सत्य और करुणा में निहित है.

हिंसा, संघर्ष और असहिष्णुता से जूझती आज की दुनियाँ में “अहिंसा परम धर्म ‘ वाला महावीर का यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है. अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से बचने को नही कहते बल्कि इसमें विचारों, शब्दों और व्यवहार में भी कोमलता और करुणा को अपनाने का आह्वान है.

आधुनिक जीवन में भी सार्थक है ‘पंच महाव्रत’

महावीर स्वामी के पंच महाव्रत, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आज भी जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने का आधार हैं. अहिंसा हमें प्राणी मात्र के प्रति संवेदनशील बनाती है. सत्य हमें ईमानदार और पारदर्शी बनाता है. अस्तेय यानी चोरी न करना. आत्मसंयम और अनुशासन का प्रतीक है ब्रह्मचर्य और आज के उपभोगवादी समाज में सबसे अधिक प्रासंगिक है अपरिग्रह.

आज समूचा समाज उपभोग और संग्रह की प्रवृत्ति से ग्रसित है. “और अधिक पाने” की अंधी चाह ने मनुष्य को भीतर से खोखला कर दिया है. ऐसे समय में महावीर के अपरिग्रह का सिद्धांत पूरी तरह से प्रासंगिक है यह हमें सिखाता है कि वास्तविक सुख कम में संतोष पाने में है न कि अधिक इकट्ठा करने में.

समाज पर गहरा है महावीर स्वामी की शिक्षाओं का प्रभाव

महावीर स्वामी की शिक्षाओं ने भारतीय समाज को भीतर से प्रभावित किया है.महावीर स्वामी के द्वारा प्रतिपादित अहिंसा का सिद्धांत को महात्मा गांधी जैसे महान नेताओं ने भी अपने जीवन का आधार बनाया. अहिंसा के सिद्धांत को गांधी जी ने केवल व्यक्तिगत आचरण तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसे सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष का भी हथियार बनाया. महावीर स्वामी के दर्शन ने समाज को यह भी सिखाया कि हर जीव में आत्मा है और हर आत्मा समान है. उनके यह विचार सामाजिक समरसता और समानता की नींव रखने के साथ जाति, धर्म, वर्ग और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करने वाला बना.

व्यक्तिगत जीवन में भी उपयोगी है महावीर स्वामी के वचन

महावीर स्वामी की शिक्षाएं समाज के साथ व्यक्तिगत जीवन के लिए भी मार्गदर्शक हैं. रफ़्तार से भरी आज की जिंदगी में तनाव, चिंता और असंतोष आम हैं. ऐसे दौर में आत्मसंयम, ध्यान और सादा जीवन का मार्ग हमें मानसिक शांति देता है. यदि हम अपने जीवन में थोड़ी भी अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह को अपनाएं तो हमारा जीवन भी बेहतर हो सकता है और समाज पहले से अधिक शांत और संतुलित बन सकता है. महावीर स्वामी का यह संदेश कि “स्वयं को जीतना ही सबसे बड़ी विजय है” आज के प्रतिस्पर्धी युग में आत्मविकास का ब्रम्हवाक्य बन सकता है.

आ चुकी है भीतर के महावीर को जगाने की शुभ बेला

महावीर जयंती का दिन हमें याद दिलाता है कि अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद जो मानव सच्चे अर्थों में महावीर के मार्ग पर चल पाता है.शांति, सहिष्णुता और संतुलन आज दुनियाँ की सबसे बड़ी ज़रूरत है. एक प्रकाशस्तंभ की तरह महावीर स्वामी की शिक्षाएं विश्व का मार्गदर्शन कर सकती हैं. उनकी शिक्षाएँ केवल सुनने के लिए नही अपितु जीवन में उतारने के लिए है. महावीर जयंती के इस पुनीत अवसर पर हम सभी को संकल्प लेना होगा कि हम अपने भीतर के महावीर को जागृत करेंगे जो अहिंसा, सत्य और करुणा के मार्ग पर चलकर न केवल अपने जीवन को, बल्कि इस संसार को भी बेहतर बनाएगा.

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