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नए साल में राहुल गांधी के लिए 26/11 बनी बड़ी चुनौती, इन 11 समस्याओं का खोजना होगा समाधान

नया साल खत्म होने में सात दिन का समय रह गया है। नये साल में लोगों को नई चुनौतियां और अवसर मिलेंगे। इन्हीं लोगों में से एक हैं कांग्रेस सांसद और लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी। नये साल में कांग्रेस आलाकमान और राहुल गांधी को 26/11 वाली टेंशन या चुनौतियां मिलने वाली है। इन चुनौतियों में केरल में गुटबाजी, कर्नाटक में सीएम पद का झगड़ा, जाति कार्ड की विफलता, और महाराष्ट्र व बिहार में हार जैसे 11 अहम मुद्दे हैं। इन सभी से राहुल गांधी को नये साल में लड़ना होगा, तभी वो देश की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी को टक्कर दें पाएंगे।

11 अहम मसलों में वो कौन-कौन मुद्दे हैं, जिनसे राहुल गांधी और कांग्रेस को जूझना पड़ेगा। इसे विस्तार से यहां समझने की कोशिश करते हैं।

1. शशि थरूर का मुद्दा- सबसे पहला और बड़ा मुद्दा केरल में गुटबाजी है। केरल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। वहीं कांग्रेस के बड़े सांसदों में से एक शशि थरूर का कांग्रेस का मोह भंग हो रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से थरूर का पीएम मोदी के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर बना हुआ है। वहीं बीजेपी भी थरूर पर कोई आरोप नहीं लगा रही है। केरल में सत्ता में वापसी की आस लगाए पार्टी को पहले इस मुद्दे को हल करना होगा। क्योंकि इसी गुटबाजी के चलते पिछले चुनाव में एक बार कांग्रेस-एक बार लेफ्ट वाला इतिहास बदलते हुए लेफ्ट ने कांग्रेस को हराकर दोबारा सत्ता हासिल कर ली थी।

2. कर्नाटक- सीएमसिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी का झगड़ा चरम पर है। इसके कारण पार्टी की छवि धूमिल हो रही है। यही कांग्रेस के पास सबसे बड़ा राज्य है। वहां भी सीएम और डिप्टी सीएम के बीच मुख्यमंत्री को लेकर जारी लड़ाई पार्टी की साख को मटियामेट कर रही है।

3. मनरेगा मुद्दा- मोदी सरकार ने यूपीए सरकार की फ्लैगशिप योजना मनरेगा को बदल दिया है। नाम से महात्मा गांधी का नाम तक हटा दिया है। इस मुद्दे को जनमानस का मुद्दा बनाने की चुनौती सामने है।

4. वोट चोरी- राहुल गांधी औ कांग्रेस लगातर वोट चोरी का मुद्दा उठा रही है। राहुल गांधी अबतक इस मुद्दे पर तीन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कई आरोप भाजपा और चुनाव आयोग पर लगा चुके हैं। इसे लेकर कांग्रेस और विपक्ष लगातार प्रदर्शन भी कर रही है। बावजूद इसके जनता के बीच इस मुद्दे को भूनाने में कामयाब नहीं हो पा रही है। राहुल गांधी के वोट चोरी के कथित सबूत पेश करने का बाद भी बिहार चुनाव में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। लिहाजा इस मुद्दे पर जनता का भरोसा जीतना राहुल गांधी के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।

5. जाति कार्ड- राहुल का जाति कार्ड बिहार में धराशायी हो गया। सवर्ण भूमिहार वर्ग के अखिलेश प्रसाद सिंह को हराकर दलित राजेश राम को अध्यक्ष बनाया, ओबीसी पार्टी राजद से समझौता किया, नतीजा सिफर।

6. सीटों का बंटवारा- हालिया चुनावों में कांग्रेस की असफलता के बाद यूपी में सपा से मनमाफिक सीटें और सीटों की संख्या गठबन्धन में हासिल करना भी उसके लिए चुनौती बन गया है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद सियासी असफलताओं ने कांग्रेस को बैकफुट पर धकेल दिया है। दरअसल, कांग्रेस यूपी में 2017 में सपा के साथ गठबंधन की तर्ज पर 100 से ज़्यादा सीटें चाहती है, जो फिलहाल सपा देने के मूड में नहीं है।

7. पंजाब में सिद्धू बम फूटा- पंजाब ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस बेसब्री से सत्ता वापसी की आस लगाए है। हालांकि पहले प्रभारी सचिव आलोक शर्मा और प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा बरार के बीच बड़ा विवाद सामने आया। अब सिद्धू बम फूटा है। खुद नवजोत सिद्धू तो खामोश हैं, सियासत से दूरी बनाए हैं। हालांकि उनकी पत्नी ने अपनी ही पार्टी पर इतने गंभीर आरोप लगाए, नवजोत सिद्धू को सीएम उम्मीदवार बनाया जाए तो वो सक्रिय राजनीति में लौटने शर्त का खुलासा किया, तो आनन फानन में उनको पार्टी से निलंबित करना पड़ा, जिससे विवाद तूल न पकड़ने पाए। अभी तक खुद नवजोत सिद्धू खामोश हैं, कांग्रेस को डर है कि, शेरी गुरु ने कहीं बोलना शुरू कर दिया तो पंजाब कांग्रेस में सिवाय फजीहत के कुछ नहीं होगा।

8. बंगाल चुनाव- बंगाल को लेकर भी 2026 के चुनाव के मद्देनजर आलाकमान को फैसला करना है। प्रदेश इकाई ने अकेले लड़ने का अपना फैसला आलाकमान को बता दिया है, तो वहीं ममता के धुर विरोधी पूर्व अध्यक्ष और ताकतवर नेता अधीर रंजन लेफ्ट के साथ तालमेल के पक्ष में हैं। वहीं खुद को इंडिया ब्लॉक लगातार हिस्सा बताती आई टीएमसी ने कांग्रेस के साथ लोकसभा में तालमेल नहीं किया। हाल में अभिषेक बनर्जी ने दिल्ली में कहा कि हम इंडिया ब्लॉक का हिस्सा हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में हमें कांग्रेस की जरूरत नही है।

9. असम में पकड़- असम में कांग्रेस ने हिमंता बिस्वा शर्मा के सामने पूर्व सीएम तरुण गोगोई के सांसद पुत्र गौरव गोगोई को कमान दी है। कांग्रेस राज्य में बदरुद्दीन अजमल बीजेपी की बी टीम बताकर अलग लड़ने का फैसला किया है, ऐसे में हिमंता की हिंदुत्व की राजनीति के सामने अजमल के साथ असदुद्दीन ओवैसी के गठबन्धन की खबरों ने कांग्रेस को परेशान कर दिया है, क्योंकि इस बार बिहार के सीमंचल ओवैसी ने महागठबन्धन को सियासी चोट दी। जबकि आखिरी वक्त तक वो सिर्फ 6 सीटें महागठन्धन का हिस्सा बनाये जाने की गुहार लगाते रहे थे और अकेले लड़कर 5 जीत गए।

10. हरियाणा की सियासत- सियासी गलियारों में चर्चा रही कि कांग्रेस ने हरियाणा चुनाव हुड्डा परिवार पर छोड़ा, पार्टी जीता चुनाव हार गई। 2010, 2015, 2020, 2025 में हुड्डा के नेतृत्व में पार्टी को बहुमत नहीं मिला। फिर भी 80 बरस के होने जा रहे भूपेंद्र हुड्डा ने 8 महीनों की जद्दोजहद के बाद विधायकों के समर्थन की ताकत दिखाकर विधायक दल का नेता पद हासिल कर लिया। ऐसे में चौधरी वीरेंद्र सिंह, कुमारी सैलजा, रणदीप सुरजेवाला समेत हुड्डा विरोधी नेता खासे नाखुश हैं। चौधरी वीरेंद्र के बेटे बिजेंद्र सिंह तो संगठन से अलग सद्भावना यात्रा निकाल रहे हैं। लगातार हारों के बाद में हरियाणा सरकार में सिर फुटौवल जारी है।

11. महाराष्ट्र में पुराने नेताओं को किनारे कर कम जाने-माने हर्षवर्धन सपकाल को अध्यक्ष बनाया। हालांकि महाराष्ट्र जैसे राज्य जो काफी बाद तक कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा वहां भी शर्मसार करने वाली हार हुई।

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