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“राम को केवल प्रेम ही प्रिय” — मर्यादा के महापर्व रामनवमी का शाश्वत संदेश

रायपुर। भारत की सांस्कृतिक चेतना में आस्था, आदर्श और आत्म अनुशासन का अद्भुत संगम प्रस्तुत करने वाला पर्व है राम नवमी। रामनवामी धार्मिक होने के साथ ही साथ जीवन-दर्शन का उत्सव भी है। यह एक ऐसा अवसर है जिसमें हम मर्यादा, सत्य और धर्म के उन सिद्धांतों को पुनः स्मरण करते हैं, जिसका मूर्त रूप प्रभु श्रीराम हैं। विविध पर्वों से सुसज्जित सनातन धर्म में राम नवमी उस दिव्य क्षण का स्मरण कराने वाला पर्व है जब भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर अवतार लेकर धर्म की पुनर्स्थापना के संकल्प को साकार किया था। वर्ष वर्ष राम नवमी स्थान और आस्था के आधार पर 26 और 27 मार्च को मनाई जा रही है। तिथि की यह विविधता पंचांग गणना के अलावा इस बात का भी प्रतीक है कि आस्था समय की सीमाओं से बिलकुल परे है।बल्कि यह इस बात का उद्घोष है कि जहां-जहां श्रद्धा है, वहीं-वहीं प्रभु श्री राम हैं।

राम नवमी की महत्ता निस्संदेह भगवान श्रीराम के जन्म से तो जुड़ी है मगर यह उस युगीन संघर्ष का भी प्रतीक है जिसमें सत्य ने असत्य पर विजय प्राप्त की थी। पृथ्वी जब अधर्म, अत्याचार और राक्षसी प्रवृत्तियों से प्रताड़ित थी तब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेकर भक्तों को संदेश दिया कि धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर स्वयं भी मानव रूप धारण करते हैं।रामनवामी में प्रभु श्री राम के प्राकट्य की अवधारणा आज के आधुनिक युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है क्योंकि आधुनिक समाज भी आज नैतिक द्वंद्वों और मूल्य-संकटों से जूझ रहा है।

वाल्मीकि रामायण में वर्णित श्रीराम का जन्म प्रसंग एक पौराणिक कथा होने के साथ एक गहन दार्शनिक संकेत भी है। राजा दशरथ के द्वारा पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराना, यज्ञ के बाद दिव्य खीर का वितरण करना और राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न का जन्म लेना यह सभी एक ऐसे दिव्य योजना का हिस्सा था जो मानवता के कल्याण के लिए रचा गया था। यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में हर उपलब्धि के पीछे तप, त्याग, श्रद्धा और एक लम्बी योजना का गहरा संबंध होता है।

‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ की उपाधि भगवान श्रीराम के जीवन के प्रत्येक पहलू में परिलक्षित होती है। एक पुत्र के रूप में भगवान राम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए राजसिंहासन का त्याग किया, एक पति के रूप में उन्होंने जानकी के प्रति अटूट निष्ठा दिखाई, एक भाई के रूप में उन्होंने प्रेम और समर्पण का अदभुत आदर्श प्रस्तुत किया और एक राजा के रूप में उन्होंने ‘रामराज्य’ की स्थापना की जो आज भी न्याय, समता और सुशासन का प्रतीक बना हुआ है। आज भी रामराज्य की अवधारणा एक प्रेरक आदर्श के रूप में सामने आती है जब शासन और समाज दोनों ही अविश्वास और नैतिक के पतन से जूझ रहे हों।

पूजा-पाठ के अलावा राम नवमी का उत्सव हमें आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करता है। यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हम अपने जीवन में सत्य और मर्यादा का पालन कर रहे हैं? क्या हमारे निर्णय न्यायपूर्ण और निष्पक्ष होते हैं? क्या हम अपने कर्तव्यों के प्रति शत प्रतिशत ईमानदार हैं? हमारे अंतरतम में उठने वाले यही प्रश्न राम नवमी के वास्तविक संदेश को जीवंत बनाते हैं।

आज के भौतिकवादी और डिजिटल युग में, जहां सफलता की कसौटी सिर्फ़ धन और प्रतिष्ठा है, वहां श्री राम का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची सफलता आत्मसंतोष, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व में समाहित है। श्रीराम ने हमेशा ही अपने व्यक्तिगत सुखों का परित्याग करते हुए समाज और धर्म के हितों को सर्वोपरि रखा। यही कारण है कि वे एक देवता और एक आदर्श पुरुष दोनो ही रूपों में पूजे जाते हैं।

राम नवमी के अवसर पर इस वर्ष पुनर्वसु नक्षत्र का दुर्लभ संयोग इस पर्व को और भी विशेष बना रहा है, जो आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। रामनवामी की भव्यता के बीच हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि इस दिन का मूल उद्देश्य आंतरिक शुद्धि और आत्मविकास है जो बाहरी उत्सवों से अधिक महत्वपूर्ण है। सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर सत्य बोलने, न्याय करने ,संयम बरतने और दूसरों के प्रति करुणा रखने की प्रेरणा देने वाले रामत्व को जागृत करें।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा है कि “रामहि केवल प्रेमु पियारा”—अर्थात् भगवान राम को केवल प्रेम प्रिय है क्यों कि प्रेम ही वह सूत्र है जो समाज को जोड़ता है, मानवता को एकता के सूत्र में बांधता है, विभाजन और वर्गीकरण को समाप्त करता है। राम नवमी हमारे आचरण में झलकना चाहिए। कण-कण में व्याप्त राम, सच्चे मन से धर्म का पालन करने वालों के हृदय में भी बसते हैं। जीवन की हर चुनौतियों में सत्य और मर्यादा का साथ न छोड़ने वाले ही विजयश्री को पाते हैं।

दरअसल, समाज को आज सच्चे आदर्शों की सबसे अधिक आवश्यकता है। राम नवमी का दिव्य संदेश सभी को एक प्रकाशस्तंभ की तरह मार्गदर्शन दे सकता है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जागृत होता रामत्व ही हमें ‘रामराज्य’की ओर ले जा सकती है।

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